मंगलवार, 3 अगस्त 2010

दलितों का निवाला राष्ट्रमंडल खेलों में झोंका!


ओ.पी. पाल
राष्ट्रमंडल खेलों की तैयारियों में जहां केंद्रीय सतर्कता आयोग की रिपोर्ट ने अनियमितताओं को उजागर करके केंद्र व दिल्ली सरकार के साथ आयोजन समिति को कटघरे में लाकर खड़ा कर दिया है, वहीं दिल्ली सरकार द्वारा अनुसूचित जाति-जनजाति वर्ग के लिए स्पेशल कम्पोनेन्ट प्लान (एससीपी) की 744.35 करोड़ की राशि को भी राष्ट्रमंडल खेलों के आयोजन में हस्तांतरित कर दी गई है। दलितों का निवाला राष्ट्रमंडल खेलों में झोंक देने का यह मामला संसद के दोनों सदनों की सुर्खियां बनने से नहीं रह सका, बल्कि राज्यसभा में इस मामले पर बहस में विपक्ष ने राष्ट्रमंडल खेलों के नाम पर इस मामले को संवैधानिक दायित्व और दलितों के अधिकारों का हनन करार दिया।

देश के सम्मान के लिए राष्ट्रमंडल खेलों पर जहां प्रतिष्ठा दांव पर हैं वहीं इन खेलों की तैयारियां गड़बड़झालों के चक्रव्यूह में फंसने से केंद्र तथा दिल्ली सरकार और आयोजन समिति कटघरे में खड़ी होती नजर आ रही है। अभी केंद्रीय सतर्कता आयोग द्वारा राष्टÑमंडल खेलों की परियोजनाओं में हजारों करोड़ रुपये की हेराफेरी होने के खुलासे पर बहस छिड़ी हुई थी कि दिल्ली सरकार की पोल खोलने वाला एक और मामले का खुलासा सामने आ गया है जिसमें अनुसूचित जाति-जनजाति वर्ग के उत्थानों के लिए जारी होने वाली कुल 744.35 करोड़ की राशि को राष्ट्रमंडल खेलों के आयोजन में हस्तांतरित किया गया है। दिल्ली की सरकार पर यह आरोप कल ही उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती द्वारा लगाते हुए कांग्रेस नेतृत्व वाली केंद्र व दिल्ली सरकार पर तीखा हमला बोलते हुए कांग्रेस को दलित विरोधी करार दिया था। दलित वर्ग के स्पेशल कम्पोनेन्ट प्लान की राशि दलितों के उत्थान के लिए निर्धारित की जाती है, जिसे दलितों की शिक्षा, स्वास्थ्य, पुनर्वास और अन्य बुनियादी सुधाएं मुहैया कराने के लिए उपयोग की जाती है, लेकिन दिल्ली सरकार ने इस वित्तीय वर्ष समेत पिछले छह सालों में जारी पूरी धनराशि 744.35 करोड़ रुपये राष्ट्रमंडल खेलों के आयोजन के लिए हस्तांतरित करके अपना दलित प्रेम होने की नीयत साफ कर दी है। हालांकि मायावती के इस आरोप को खारिज करते हुए दिल्ली की मुख्यमंत्री श्रीमती शीला दीक्षित का कहना है कि राष्ट्रमंडल खेलों से जुड़ी किसी भी परियोजना के लिए अनुसूचित जाति-जनजाति पुनर्वास कोष से कोई राशि नहीं ली गई। जबकि मायावती के इन आरोपों की गूंज राज्यसभा में इतने जोरशोर से सुनाई दी कि सदन में इस मामले पर चर्चा करानी पड़ी, जिसमें प्रधानमंत्री कार्यालय के राज्यमंत्री पृथ्वीराज चव्हाण को इस बहस का विस्तार का जवाब अगले सप्ताह देने का आश्वासन देना पड़ा। जहां तक इस मुद्दे पर राज्यसभा में हुई बहस का सवाल है उसमें समूचे विपक्ष ने मायावती के इस आरोप की सूचना के अधिकार के तहत उजागर हुए तथ्यों के आधार पर पुष्टि की। भाजपा के वेंकैया नायडू ने कहा कि यह तथ्य स्वयं शिवानी चौधरी के आरटीआई सवालों के जवाब में दिल्ली सरकार के नौकरशाहों ने ही उपलब्ध कराए हैं। नायडू का कहना है कि दलितों के उत्थान की दुहाई देने वाली कांग्रेसनीत सरकार ने यह एक संवैधानिक अधिकार को तोड़ने का काम किया है जो बेहद ही दुरभाग्यपूर्ण है। इस मामले को बसपा सांसद सतीश मिश्रा ने उठाया था, जिसमें उन्होंने इस मामले की जांच के लिए संयुक्त संसदीय समिति से कराकर दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई करने की मांग की है। इस मुददे पर हुई बहस में माकपा की वृंदा करात ने तो राष्ट्रमंडल खेलों के नाम पर उनके कोटे की राशि को खर्च करने के काम को दलितों के अधिकार का उल्लंघन और आर्थिक अत्याचार की संज्ञा दी। उन्होंने इस मामले में योजना आयोग पर भी सवाल खड़े किये जिसके अध्यक्ष स्वयं प्रधानमंत्री हैं और योजना आयोग के वर्ष 2005 के एक सर्कुलर का हवाला देते हुए कहा कि आयोग के स्पष्ट दिशानिर्देश हैं कि एससी/एसटी/ओबीसी कोटे की राशि को किसी अन्य मद में खर्च नहीं किया जाना चाहिए। इस चर्चा में भाकपा के डी. राजा, राजद के राजनीति प्रसाद, सपा के महेन्द्र मोहन, लोजपा के साबिर अली, कांग्रेस के जनार्दन द्विवेदी व भालचन्द्र मुंगेकर आदि ने हिस्सा लिया, जिसमें विपक्ष के सभी सदस्यों ने दलित वर्ग के उत्थान के लिए जारी होने वाली इस राशि पर दिल्ली सरकार के साथ केंद्र सरकार पर भी सवालिया निशान खड़े किये। कुछ संसद सदस्यों ने तो इस मामले को संवैधानिक दायित्व का हनन करार देते हुए इस प्रकरण की उच्च स्तरीय जांच कराकर दोषियों के खिलाफ आपराध की श्रेणी में कानूनी कार्यवाही करने की वकालत की है। सवाल यह उठता है कि राष्ट्रमंडल खेलों को पूरा देश राष्ट्र गौरव मानकर चल रहा है, लेकिन इन खेलों की तैयारियों में जिस प्रकार से शर्मनाक ढंग से मामले उजागर हो रहे हैं उसके लिए जवाबदेह कौन है? इसी सवाल को उठाते हुए सदन में अल्पकालिक चर्चा कराई गई ताकि इस मामलें को केंद्र सरकार संज्ञान में लेकर ऐसे ठोस कदम उठाए ताकि राष्ट्रमंडल खेलों के आयोजन के दौरान कोई व्यवधान उत्पन्न न हो सके।

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