रविवार, 27 जून 2010

सईद को क्यों बचाना चाहता है पाक!

ओ.पी. पाल
पाकिस्तान ने लश्कर-ए-तैयबा के आतंकी और जमात-उद-दावा प्रमुख हाफिज सईद की भारत के खिलाफ जहरीले प्रहार को लोकतंत्र में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता करार दिया और उसकी जहरीली जुबान पर ताला लगाने से इंकार कर दिया है। इसका मतलब साफ है कि पाकिस्तान हाफिज सईद के खिलाफ किसी भी प्रकार की कार्रवाई नहीं करना चाहता है? लेकिन सवाल है कि यदि पाकिस्तान का यही रवैया रहा तो भारत और पाकिस्तान की बातचीत आगे कैसे बढ़ सकेगी। विशेषज्ञ मानते हैं कि लोकतंत्र में सभी को अपनी बात कहने का अधिकार है, लेकिन हाफिज सईद मुंबई आतंकी हमलों का प्रमुख गुनाहगार है इसलिए उसकी इस जहरीली जुबान पर पाकिस्तान को ताला जड़ने में कोई ऐतराज नहीं होना चाहिए। मुंबई के 26/11 आतंकी हमले के बाद भारत और पाकिस्तान की स्थगित बातचीत फिर से शुरू की गई है, ताकि दोनों पड़ोसी देशों में बेहतर सम्बन्ध स्थापित हो सकें। इसी मकसद से पहली सचिव स्तरीय वार्ता नई दिल्ली में 25 फरवरी को हुई थी जो बेनतीजा रही। हाल में गृहमंत्री पी. चिदम्बरम के नेतृत्व में भारतीय शिष्टमंडल इस्लामाबाद में सार्क सम्मेलन के दौरान पाकिस्तान में हैं, जिससे पहले भारत और पाकिस्तान के विदेश सचिवों क्रमश: सुश्री निरुपमा राव तथा सलमान बशीर के बीच कई मुद्दों पर दूसरी सचिव स्तरीय वार्ता हुई, लेकिन बात आतंकवाद के खिलाफ खासकर मुंबई आतंकी हमलों के दाषियों के खिलाफ कठोर कार्रवाई भारत का प्रमुख एजेंडा रहा। दोनों देशों के गृहमंत्रियों के बीच हुई बैठक में भी आतंकवाद का मुद्दा छाया रहा, लेकिन जमात-उद-दावा के प्रमुख हाफिज सईद के नाम पर पाकिस्तान भारत की कोई बात सुनने को तैयार नहीं है, जो लगातार भारत के खिलाफ जहरीले भाषण देकर दोनों देशों के बीच sambandhon को आगे बढ़ाने में बाधक भी बना हुआ है। जबकि 15 जुलाई को दोनों देशों के विदेश मंत्रियों की वार्ता भी प्रस्तावित है। ऐसे में भारत की इस मांग को पाकिस्तान ने एक सिरे से खारिज कर दिया कि वह हाफिज सईद के भड़काऊ भाषणों पर रोक नहीं लगा सकता। पाकिस्तान ने अपनी असमर्थता में लोकतंत्र में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का तर्क देते हुए भारत की मांग को ठुकराया है। पाकिस्तान की शायद हाफिज सईद को बचाना एक मजबूरी बन रहा है, क्योंकि यदि पाकिस्तानी रणनीतिकारों की माने तो यदि सईद मुंबई आतंकी हमले का सच यानि अपना गुनाह कबूल करता है तो उसमें वह पूरे पाकिस्तानी सरकारी तंत्र को भी निश्चित रूप से बेनकाब करके कठघरे में खड़ा कर सकता है। पाकिस्तानी सरकार की नब्ज उसके हाथ में होने के कारण ही उसे बचाने का प्रयास किया जा रहा है यानि पाक सरकार एक झूठ को छिपाने के लिए सौ झूठ बोलने का प्रयास कर रही है ताकि 26/11 हमलों में पाकिस्तान सरकार पर कोई दाग न लग सके। एक रक्षा विशेषज्ञ का कहना है कि दरअसल पाकिस्तान आतंकवादियों के खिलाफ कार्रवाई करने के कतई मूड़ में नहीं है, जो हमेशा आतंकवादियों के खिलाफ कार्रवाई के नाम पर टालमटोल करता आ रहा है। लोकतंत्र में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का जिस प्रकार से पाकिस्तानी विदेश मंत्री शाह महमूद कुरैशी ने हवाला देकर हाफिज सईद को भड़काऊ भाषणों पर रोक लगाने से इंकार किया है, वह कतई तर्कसंगत नहीं है, क्योंकि हाफिज सईद आतंकवादी है और मुंबई हमलों में भी भारतीय अदालत द्वारा उसे दोषी करार दिया गया है। इसलिए पाकिस्तान को यदि भारत के साथ बेहतर संबंधों के लिए आगे बढ़ना है तो उसे हाफिज सईद के प्रति इतनी हमदर्दी नहीं दिखानी चाहिए और समझना चाहिए कि वह एक आतंकवादी है। इस बात की एक नहीं कई बार पुष्टि हो चुकी है कि पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई और सेना आतंकवादी संगठनों को हर तरह की मदद मुहैया कराती आ रही है, जिसका खुलासा अमेरिका में पकड़े गये 26/11 के मास्टर माइंड डेविड कोलमेन हेडली ने भारत की राष्ट्रीय जांच एजेंसी के समक्ष पूछताछ के दौरान भी किया है। विशेषज्ञ मानते हैँ कि पाकिस्तान हमेशा इस प्रकार की नीतियां अपनाकर भारत के खिलाफ आतंकवाद को बढ़ावा देता रहा है। पाकिस्तान द्वारा भारत की इस मांग को खारिज करने से निश्चित रूप से हाफिज सईद के हौंसले बुलंद होंगे। भारत और पाक के जानकार विशेषज्ञों का कहना है कि यह तो पहले से ही जाहिर था कि सीमापार आतंकवाद के मुद्दे को पाकिस्तान ज्यादा तरजीह नहीं देना चाहेगा, जाकि भारत का प्रमुख मुद्दा आतंकवाद ही है। इसका कारण भी साफ है कि आईएसआई और पाक सेना पर वहां की सरकार का नियंत्रण नहीं है। हाफिज सईद के खिलाफ कार्रवाई करने का तो कोई सवाल ही नहीं उठता, जिसे पाकिस्तान जमात-उद-दावा संगठन के नाम पर करीब चार करोड़ की सहायता हाल ही में दे चुका है। विशेषज्ञ मानते हैं कि हाफिज सईद को पाकिस्तान एक सच्चा देशभक्त मानता है जिसे हर तरह की सुरक्षा और सुविधा मुहैया कराई जा रही है। लेकिन सवाल यह है कि एक तरफ पाकिस्तान, भारत के साथ शांति और आपसी संबंधों को बेहतर बनाने की बात करता है, तो दूसरी तरफ वह आतंकवाद के खिलाफ कार्रवाई करने की बात तो कहता है लेकिन उस पर अमल करना नहीं चाहता। ऐसे में भारत और पाकिस्तान की बातचीत का आगे बढ़ना मुश्किल है जिसके लिए भारत को पाकिस्तान से ज्यादा उम्मीद करना भी बेमानी होगी।

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